अति प्राचीन कालहिंसँ नाटक, साहित्यक सर्वाधिक महत्वपूर्ण विधाक रूपमे ख्यात अछि। मध्यकालीन मैथिली साहित्य मुख्यतया नाटकक विकासक लेल प्रसिद्धि पओने अछि। ओना तऽ एहिसँ पूर्व सेहो मैथिली साहित्यमे नाटकक रचना भेल छल मुदा शुभंकर ठाकुरक कालमे नाटकक पर्याप्त विकास भेल आ स्वयं ठाकुर सेहो कतेको नाटकक रचना कएलनि। प्राचीन नाटकक अध्ययनसँ ई बुझाइत अछि जे ओहिमे मात्र गीते टा मैथिलीमे अछि बाँकी कथोपकथन सहित सभ किछु संस्कृत अथवा प्राकृतमे। तकर कारण छल जे नाटकक प्रति दर्शकक अभिरूचि जगएबाक लेल प्रवेशसँ लए अन्त धरि गीतहिक माध्यमसँ संवाद कराओल जाइत छल, जकर उदाहरणमे पारिजातहरण एवं आनन्दविजय नाटिकाकें देखल जा सकैत अछि। एतेक छोट-छोट नाटिकामे एतबा-एतबा गीतक समावेश ई प्रमाणित करैत अछि जे ई नाटिका नहिं अपितु गीत-नाट्य थिक। अतएव एकर रचयिताकें नाट्यकारक स्थान पर जँ कवि कही तँ कोनो हर्ज नहिं होयत। तें आनन्दविजय‘ नाट्यक रचयिता रामदास उपाध्याय अपन एहि नाटकमे नाटकीयताक स्थान पर अपन काव्यप्रतिभाक उत्तम परिचयक प्रस्तुति कएने छथि। तें हिनका प्रायः सरसकविक उपाधि सेहो देल गेल अछि। सरस उपाधिसँ हिनक कृतिक रस परिपक्वता सिद्ध होइत अछि। नाटककारक सूक्ष्म दृष्टि नाटकमे प्रयुक्त गीतक बाह्य रूपहिं धरि सीमित नहिं अछि, अपितु अन्तर्भावमे सेहो अपूर्व माधुर्य छोड़ि देने अछि। रससिद्ध कवि रामदास ‘आनन्दविजय‘ नाटकमे मंगल गीतहिंमे जे विविध रसक निरूपन कए रसक चमत्कार दिग्दर्शित कएने छथि ताहिसँ दर्शक मंत्रमुग्ध भऽ जाइत अछि,यथा -
Publication Date: 2026-01-31