हिंदी उपन्यासों में नारी चेतना का विकासः

Description

नारी चेतना एक बहुआयामी अवधारणा है जो केवल स्त्री के अधिकारों या स्वतंत्रता की मांग तक सीमित नहीं रहती, बल्कि यह उस संपूर्ण बौद्धिक, सामाजिक, भावनात्मक और सांस्कृतिक आंदोलन की प्रतीक है जिसमें स्त्री अपने आत्मसम्मान, अस्तित्व, पहचान और भूमिका को नए सिरे से परिभाषित करती है। भारतीय समाज की संरचना पारंपरिक रूप से पितृसत्तात्मक रही है, जिसमें स्त्री की भूमिका को सीमित कर दिया गया था—एक बेटी, पत्नी, मां या बहन के रूप में। किंतु जैसे-जैसे समाज में परिवर्तन आए, वैसे-वैसे स्त्री की चेतना भी विकसित होती गई। इस परिवर्तन और चेतना की अभिव्यक्ति साहित्य में, विशेषकर हिंदी उपन्यासों में अत्यंत प्रभावशाली रूप में सामने आई है।

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DOI: 10.5281/zenodo.20740649

Publication Date: 2026-01-31

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