21वीं सदी के हिंदी उपन्यासों में आदिवासी जीवन, इतिहास और संघर्ष का सशक्त व यथार्थपरक चित्रण हुआ है। इन उपन्यासों में आदिवासी समाज की समस्याएँ—शोषण, गरीबी, कर्ज, बेरोजगारी, शिक्षा में भ्रष्टाचार, विस्थापन और सांस्कृतिक पतन—केंद्र में हैं। राकेश कुमार सिंह का ‘पठार पर कोहरा’ आज़ादी के बाद भी आदिवासियों के जीवन से न हटने वाले शोषण के ‘कोहरे’ को उजागर करता है। रणेंद्र का ‘ग्लोबल गाँव के देवता’ भूमंडलीकरण से ‘असुर’ जनजाति की नष्ट होती संस्कृति और अस्मिता को दर्शाता है। महुआ माजी का ‘मरंग गोडा निलकंठ हुआ’ विकिरण और विस्थापन की समस्या उठाता है। ‘बाजत अनहद ढोल’, ‘धूणी तपे तीर’ और ‘जो इतिहास में नहीं है’ जैसे उपन्यास ऐतिहासिक आदिवासी विद्रोहों और बलिदानों को पुनर्जीवित करते हैं। वहीं ‘कुर्राटी’ पलायन और उभरती आदिवासी चेतना को अभिव्यक्त करते हैं। समग्रतः इस सदी के उपन्यास जल-जंगल-जमीन की लड़ाई और आदिवासी अस्मिता की सशक्त आवाज़ हैं।
Publication Date: 2026-02-16