21 वीं सदी का साहित्य सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक परिवर्तनों का सजीव दस्तावेज़ है। वैश्वीकरण, उदारीकरण, निजीकरण, तकनीकी क्रांति तथा शिक्षा के विस्तार ने स्त्री की पारंपरिक भूमिका को गहराई से प्रभावित किया है। इस सदी में स्त्री केवल गृहस्थ जीवन तक सीमित न रहकर कार्यक्षेत्र में सक्रिय, आत्मनिर्भर और निर्णयक्षम व्यक्तित्व के रूप में उभरकर सामने आती है। समकालीन हिंदी उपन्यासों में कार्यरत स्त्री की छवि संघर्षशील होने के साथ-साथ आत्मचेतन, सशक्त और परिवर्तनकारी दिखाई देती है। वह आर्थिक स्वावलंबन के माध्यम से अपनी पहचान गढ़ती है तथा पितृसत्तात्मक सामाजिक संरचनाओं को चुनौती देती है। यह शोधपत्र 21वीं सदी के चुनिंदा हिंदी उपन्यासों के आधार पर कार्यरत स्त्री की नई छवि, उसके सामाजिक‑पारिवारिक संघर्ष, कार्यस्थल की चुनौतियाँ, आत्मपहचान और स्त्री विमर्श के व्यापक संदर्भों का विश्लेषण प्रस्तुत करता है।
Publication Date: 2026-02-16