२१ वीं सदी के हिंदी साहित्य में स्त्री विमर्श

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आज नारी जिस मोड़ पर खड़ी है उसके अस्तित्व के प्रति संदेह व्यक्त किया जा रहा है। क्या सचमुच नारी को वह सम्मान प्राप्त हो सका है, जिसकी वह आकांक्षा करती आई है? क्यों आवश्यक हो जाता है कि, पुरुष प्रधान समाज में नारी विमर्श की स्थापना हो और उसे सशक्त बनाया जाए?

21वीं शताब्दी में नारी का उत्थान और पतन दोनों एक ही अनुपात में हुए हैं। उत्थान का तात्पर्य नारी के प्रगतिशील जीवन दर्शन से और पतन का तात्पर्य उसके सामाजिक तिरस्कार से है। परिवार में सामंजस्य और संतुलन बनाए रखने के लिए उसका योगदान उसी के गले आ पड़ा।‌"नारी लक्ष्मी है, नारी देवी है, नई माता है, किंतु नारी नारी है। यह दर्शन अभी तक पनप नहीं सका। इसलिए तो नारी की स्थिति चिंताजनक है।"1 चिंता का विषय है की नारी आकांक्षा तो करती है किंतु उस आकांक्षा के पीछे अपने आप को नहीं लगा पाती और भटकाव की स्थिति में पहुंच जाती है। लखनऊ के एक स्कूल की अध्यापिका सरला प्रधान का कहना है पुरुष की सत्ता हर कदम पर हर मोड़ पर समायी है इसमें अपने आप को नारी की स्थिति में भी सिद्ध करना अत्यंत कठिन है। केवल अपने स्थिति का बोध होते ही अपने ऊपर तरस खाया जा सकता है। गहराई तक इस तथ्य पर विचार किया जाए तो यह बात सत्य है जब दिशा जागृत होता है तब नारी होने का दुख भारी पड़ने लगता है।

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DOI: 10.5281/zenodo.18654460

Publication Date: 2026-02-16

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